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राज्यसभा ने भी दी हरी झंडी, सुप्रीम कोर्ट में अब होंगे 38 न्यायाधीश

Ratna Netam
5 Aug 2026 5:26 PM IST
राज्यसभा ने भी दी हरी झंडी, सुप्रीम कोर्ट में अब होंगे 38 न्यायाधीश
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नई दिल्ली : देश की न्यायिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी, सक्षम और समयबद्ध बनाने की दिशा में संसद ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट में बढ़ते लंबित मामलों और न्यायिक बोझ को कम करने के उद्देश्य से संसद ने 'सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026' को मंजूरी दे दी है। लोकसभा से पारित होने के बाद बुधवार को राज्यसभा ने भी इस विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इसके साथ ही अब सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सहित स्वीकृत न्यायाधीशों की कुल संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी गई है।

राज्यसभा में केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने दोपहर बाद सदन की कार्यवाही के दौरान यह विधेयक पेश किया। विधेयक पेश होते ही विपक्षी दलों ने इसका विरोध करते हुए हंगामा शुरू कर दिया। हालांकि पीठासीन अधिकारी डॉ. दिनेश शर्मा ने विधेयक को सदन में प्रस्तुत करने और उस पर चर्चा की अनुमति दी। उन्होंने विपक्षी सदस्यों से बहस में भाग लेने का आग्रह भी किया, लेकिन विपक्ष ने विरोध स्वरूप सदन से वॉकआउट कर दिया। इसके बाद सत्ता पक्ष और अन्य सदस्यों ने विधेयक पर चर्चा की तथा अंत में इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया। संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलने के बाद अब यह विधेयक कानून बनने की दिशा में आगे बढ़ गया है।

यह संशोधन 'सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956' में बदलाव करता है। इसके तहत मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर अन्य न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है। मुख्य न्यायाधीश के पद को जोड़ने पर सुप्रीम कोर्ट की कुल स्वीकृत न्यायाधीश संख्या अब 38 हो जाएगी। इससे पहले वर्ष 2019 में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 34 की गई थी। सरकार का मानना है कि बदलते समय और लगातार बढ़ते मुकदमों को देखते हुए यह विस्तार आवश्यक हो गया था।

देश की न्यायपालिका इस समय लंबित मामलों की बड़ी चुनौती का सामना कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में हजारों मामले वर्षों से लंबित हैं, जिनमें संवैधानिक महत्व के कई अहम विवाद भी शामिल हैं। सरकार का कहना है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से मामलों के निपटारे की गति तेज होगी, सुनवाई में लगने वाला समय कम होगा और लोगों को समय पर न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी। इसके अलावा संवैधानिक पीठों के गठन में भी आसानी होगी, जिससे महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक मामलों का शीघ्र निस्तारण किया जा सकेगा।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से न्यायिक कार्यभार का बेहतर बंटवारा होगा। इससे नियमित अपीलों के साथ-साथ जनहित याचिकाओं, संवैधानिक विवादों और अन्य महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई अधिक व्यवस्थित ढंग से हो सकेगी। हालांकि कई कानूनी विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि खाली पदों को समय पर भरना, आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ाना और अधीनस्थ न्यायालयों को भी मजबूत करना आवश्यक है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार संसद को कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त है। इसी संवैधानिक प्रावधान के तहत समय-समय पर बढ़ती जरूरतों के अनुसार न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की जाती रही है।

सुप्रीम कोर्ट की स्थापना वर्ष 1950 में हुई थी, तब मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 8 न्यायाधीश थे। इसके बाद 1956 में संख्या बढ़ाकर 11, 1960 में 14, 1978 में 18, 1986 में 26, 2009 में 31, 2019 में 34 और अब 2026 में 38 कर दी गई है। यह क्रम दर्शाता है कि देश में न्यायिक मामलों की बढ़ती संख्या और बदलती आवश्यकताओं के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय की संरचना लगातार विस्तारित की जाती रही है।

सरकार का कहना है कि यह संशोधन केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य न्याय प्रणाली को अधिक सक्षम, पारदर्शी और प्रभावी बनाना है। आने वाले समय में यदि रिक्त पदों पर शीघ्र नियुक्तियां होती हैं, तो इससे सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के निपटारे की रफ्तार बढ़ने और आम नागरिकों को समय पर न्याय मिलने में महत्वपूर्ण सहायता मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

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